पंचायती राज, बिहार में पंचायती राज की व्यवस्था कब लागू हुई

बिहार में पंचायती राज की व्यवस्था को आज हम यहां पर विस्तार पूर्वक जानेंगे इसलिए आप इस पूरी पोस्ट को पढ़ें

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शासन के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत को लागू करने के उद्देश्य से भारत में पंचायती राज की स्थापना की गई है। पंचायती राज का अर्थ है, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए त्रिस्तरीय स्थानीय संस्थाओं का गठनग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति, और जिला स्तर पर जिला परिषद या जिला पंचायत। 1993 के संविधान के 73 वें संशोधन में भी कहांं गया है कि ग्राम स्तर, मध्य स्तर (प्रहांड, तालुका, जनपद आदि) तथा जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा। अतः अब पंचायती राज की संस्थाओं को संविधानिक मान्यता प्राप्त हो गई है।

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बिहार में पंचायती राज की व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास पहले भी होता रहा है। इसके लिए बिहार सरकार ने अनेक अधिनियमों को पारित किया। वर्तमान में बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 के अनुसार ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति, और जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन किया गया है।

यदि आप ग्राम पंचायत को विस्तार पूर्वक जानना चाहते हैं तो आप यह पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ें

ग्रामीण स्थानीय संस्थाओं में ग्राम पंचायत का स्थान महत्वपूर्ण है। ग्राम पंचायत का इतिहास बहुत पुराना है। 1947 में ही बिहार में पंचायती राज अधिनियम बना। समय-समय पर इस अधिनियम में अनेक संशोधन होते रहे। वर्तमान में बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 के अनुसार ग्राम पंचायतों का गठन किया गया है

बिहार में पंचायती राज के ग्राम पंचायत किस क्षेत्र को घोषित कर सकता है

ग्राम पंचायत का गठन अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि बिहार सरकार के आदेश से जिला दंडाधिकारी जिला गजट में अधिसूचना निकालकर किसी स्थानीय क्षेत्र को जिसमें कोई गांव या निकटस्थ गांवों के समूह या उसका कोई भाग होगा ग्राम पंचायत क्षेत्र घोषित कर सकता है।

इस क्षेत्र की जनसंख्या लगभग 7000 के निकटतम होगी जिला दंडाधिकारी संबंध ग्राम पंचायत से परामर्श कर अधिसूचना द्वारा किसी भी समय उस ग्राम पंचायत में किसी गांव या उसके किसी भाग को शामिल है उससे अलग कर सकता है और ग्राम पंचायत का नाम भी बदल सकता है।

निर्वाचन– प्रत्येक ग्राम पंचायत प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों तथा मुखिया से मिलकर बनती है। प्रत्येक ग्राम पंचायत को कई निर्वाचन क्षेत्रों (वार्डों) में बांट दिया जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य निर्वाचित होकर आते हैं। लगभग 500 की जनसंख्या के लिए एक वार्ड बनाया जाता है। दूसरे शब्दों में एक प्रतिनिधि 500 की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।

स्थानों का आरक्षण- प्रत्येक ग्राम पंचायत में ग्राम पंचायत के सदस्यों के कुल स्थानों के लगभग 50% परंतु इससे अधिक स्थान निम्न वर्गों के लिए आरक्षित रखते हैं।

  • अनुसूचित जाति
  • अनुसूचित जनजाति
  • पिछड़े वर्ग।

उन तीनों वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित रहते हैं। अधिनियम में यह प्रावधान कर दिया गया है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का वही अनुपात होगा जो उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या में उनका है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण के बाद आरक्षण कोटि का जो शेष स्थान बचता है उसमें 20% से अधिक पिछड़े वर्ग के लिए नहीं होगा। आरक्षित स्थान की कुल संख्या का लगभग 50% स्थान उन वर्गों की महिलाओं के लिए होगा। शेष बचे अनारक्षित स्थानों का भी लगभग 50% स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। सभी आरक्षित स्थानों का आवंटन चक्रानुक्रम से जिला दंडाधिकारी द्वारा करने का प्रावधान किया गया है।

मुखिया का निर्वाचन प्रत्यक्ष ढंग से ग्राम पंचायत के मतदाताओं द्वारा होता है। मुखिया पद पर आरक्षण का वही नियम लागू होता है जो निर्वाचित सदस्यों के लिए है।