राजनीतिक दल का क्या अर्थ है

किसी देश में लोकतंत्र की सफलता के लिए राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है। भारतीय लोकतंत्र में भी राजनीतिक दलों का महत्वपूर्ण स्थान है। राजनीतिक दलों को लोकतंत्र का प्राण कहा गया है। जनता के प्रतिनिधियों का निर्वाचन राजनीतिक दलों के माध्यम से ही संभव है। भारत में बहुदलीय पद्धति अपनाई गई है। 2014 के आम चुनाव तक यहां मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों की संख्या 6 और राज्यस्तरीय दलों की संख्या 42 थी। इनके अतिरिक्त अनेक अमान्य पंजीकृत दल है। प्रत्येक राजनीतिक दल के अपने-अपने कार्यक्रम होते हैं। निर्वाचन के समय वे अपना घोषणा पत्र जारी करते हैं। राजनीतिक दल अपने स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय हित की भी परवाह नहीं करते। राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता की आवश्यकता पड़ती है। जिस दल को बहुमत मिलता है उसके नेतृत्व में ही सरकार का गठन होता है। इसे सत्तारूढ़ दल कहा जाता है। सत्तारूढ़ दल के साथ-साथ विपक्षी दल भी होते हैं।

राजनीतिक दल को लोकतंत्र का प्राण क्यों कहा जाता है

राजनीतिक दल लोकतंत्र की आधारशिला है। बिना राजनीतिक दल के हम लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं कर सकते। जिन देशों में राजनीतिक दलों को काम करने की स्वतंत्रता नहीं रहती वहां के नागरिकों को स्वतंत्रता नहीं मिलती। इसी आधार पर राजनीतिक दलों को लोकतंत्र का प्राण कहा जाता है।

लोकतंत्र ऐसी शासन पद्धति है जिसमें शासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता है। राजनीतिक दल प्रतिनिधियों के निर्वाचन में मुख्य रूप से भाग लेते हैं। लोकतंत्र को दलीय शासन (Party government) भी कहा जाता है।

राजनीतिक दलों के क्या कार्य है

  • जनता को शिक्षित करना– आज का राजनीतिक जीवन बहुत जटिल हो गया है आम जनता को राजनीति का ज्ञान होना जरूरी है। राजनीतिक मामलों में नेता को शिक्षित करने का काम राजनीतिक दल ही करते हैं। वह अपना कार्यक्रम नीति और दृष्टिकोण जनता के सामने रखते हैं। इससे जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।
  • जनमत का निर्माण – राजनीतिक दल जनमत का भी निर्माण करते हैं। जनता के सामने तरह-तरह के नारे देते हैं। इससे जनता देश की राजनीतिक समस्याओं पर अपना मत निश्चित कर पाते हैं। लोकतंत्र में जनमत का बहुत महत्व है।
  • निर्वाचन में भाग लेना – राजनीतिक दलों का सबसे मुख्य कार्य चुनाव में भाग लेना है। चुनाव लड़ने के लिए वे अपने उम्मीदवार खड़े करते हैं। जिस राजनीतिक दल के अधिक लोग निर्वाचित होकर आते हैं उसी की सरकार बनती है।
  • शासन चलाना- राजनीतिक दल देश के शासन में मुख्य रूप से भाग लेते हैं। जिस राजनीतिक दल की सरकार बनती है उसे सत्तारूढ़ दल कहा जाता है। सत्तारूढ़ दल की बैठक में ही सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों का निर्धारण होता है। लोकतांत्रिक सरकार को राजनीतिक दल की सरकार के नाम से भी पुकारा जाता है।
  • सरकार की आलोचना करना- सत्तारूढ़ दल के अलावा देश में विरोधी दल भी होते हैं। जो राजनीतिक दल चुनाव में बहुमत प्राप्त नहीं करते वे विरोधी दल कहलाते हैं। वे दलों का काम सरकार का ध्यान उनकी गलतियों की ओर दिलाना है। वह सरकार की आलोचना करते हैं। इससे सरकार अपने कार्यों के प्रति सजग रहती है।
  • जनता की शिकायतें सुनना- राजनीतिक दलों का काम जनता की शिकायतें सुनना भी है। विरोधी दल जनता की शिकायत को सत्तारूढ़ दल के सामने रखते हैं। सत्तारूढ़ दल जनता की शिकायतों को दूर करने की कोशिश करता है। इस प्रकार राजनीतिक दल, जनता और सरकार के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं।
  • अनुशासन कायम करना- राजनीतिक दलों का काम अपने सदस्यों के बीच अनुशासन कायम रखना है। जिस दल में संगठन और अनुशासन का अभाव रहता है। उस दल को विशेष सफलता नहीं मिलती।
  • विद्रोह को दबाना- राजनीतिक दल देश में विद्रोह को दबाने का भी काम करते हैं। वे सरकार को शांतिमय और कानूनी तरीकों से बदलने की कोशिश करते हैं। राजनीतिक दलों से जनता का विश्वास लोकतंत्र में बना रहता है। इससे विद्रोह की संभावना नहीं रहती। विद्रोह होता भी है तो उसका रूप अहिंसात्मक ही रहता है।

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राजनीतिक दलों का राष्ट्रीय विकास में योगदान

लोकतंत्र की सफलता की आवश्यक शर्तों में एक शर्त यह भी है कि लोकतंत्र राष्ट्रीय विकास के पथ पर अग्रसर रहें। किसी भी देश का विकास उस देश के राजनीतिक दलों के कार्यकलापों पर निर्भर करता है। राजनीतिक दल का मुख्य कार्य है कि वह जनता को राजनीतिक शिक्षा देकर जागरूक बनाएं। किसी राष्ट्र के विकास के लिए जनता में जागरूकता चेतना एकता राजनीतिक स्थिरता होना आवश्यक है। विविधता में एकता स्थापित करने में भी राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण बन जाती है। विभिन्न जाती, धर्म, वर्ग, संप्रदाय, लिंग, के लोगों के बीच एकता का पाठ पढ़ाना राजनीतिक दल का ही काम है। राष्ट्र के विकास के लिए राजनीतिक स्थिरता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। जिसे राजनीतिक दल ही पूरा कर सकते हैं। राष्ट्रीय विकास के लिए देश में राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ शांति और अमन चैन आवश्यक है। ऐसी स्थिति बनाए रखना भी राजनीतिक दलों का काम है। राजनीतिक दल जो सत्ता में रहते हैं राष्ट्र के विकास के लिए विभिन्न नीतियों और कानूनों का निर्माण करते हैं। विपक्षी दलों का भी उस में सहयोग होता है। राजनीतिक दल भी इस बात का प्रयास करते हैं कि शासन के निर्णयों में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी हो। इससे जनता को संतुष्टि मिलती है कि राष्ट्र के विकास में उनका भी योगदान हो रहा है।

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राजनीतिक दलों के समक्ष समस्याएं

सभी लोकतांत्रिक राज्य में politics party भी अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनके समक्ष भी अनेक चुनौतियां हैं। यह बात सरविवादित है उनके समक्ष भी अनेक चुनौतियां हैं। यह बात सरविवादित है कि लोकतांत्रिक शासन को चलाने का उत्तरदायित्व राजनीतिक दलों का ही होता है। फिर भी राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर आने पर जनता के असंतोष का भी सामना करने के लिए उन्हें तैयार रहना पड़ता है। राजनीतिक दलों में आंतरिक कलह भी उनकी दुर्बलताओं को जनता के समक्ष उजागर कर देता है। प्रत्येक राजनीतिक दल ने निर्णय लेने की शक्ति कुछ ही नेताओं के हाथों में सीमट जाने से आंतरिक लोकतंत्र की कमी हो जाती है और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता दल के कार्यों के प्रति उदासीन हो जाते हैं। प्राय: सभी राजनीतिक उन दिनों में भाई भतीजावाद का बोलबाला दिखाएं पड़ता है। यहां तक कि राजनीतिक दल के वरिष्ठ नेता भी अपने सगे संबंधियों को चुनाव में उतारने के लिए बेचैन दिखाई पड़ते हैं। जब इस प्रयास में उन्हें असफलता मिलती है तो अपने राजनीतिक दल से नाता तोड़कर दूसरी राजनीतिक दल का दामन थाम लेते हैं। वंशवाद का बोलबाला हो जाता है। और उनके द्वारा लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जाने लगती है। सबसे दुखद बात तो यह है कि जिस दूसरे दल के नेता के गलतियों का वर्णन करने में जो नेता नहीं चूकते थे वही उस नेता के गुणगान करने में तब लग जाते हैं जब अपना दलछोड़कर उनके दल में सम्मिलित हो जाते हैं। प्राय: प्रत्येक राजनीतिक दल के नेता अपने politics उद्देश्य की पूर्ति में अपराधियों की सहायता तो लेते ही हैं। वह काले धन के प्रयोग में भी नहीं हिचकते। जब तक इन समस्याओं को राजनीतिक दल से जुड़े नेता हल नहीं कर लेते तब तक वह राष्ट्रीय विकास में सही भूमिका नहीं निभा सकते।

Narendra Modi

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विपक्ष की क्या भूमिका है

लोकतंत्र की सफलता की आवश्यक शर्तों में एक शर्त यह भी है कि एक सशक्त विपक्षी दल अवश्य रहे। भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि ब्रिटेन और अमेरिका की तरह ऐसा कोई विरोधी दल नहीं है जो अकेले अपनी सरकार बनाने में समर्थ हो सके। 1977 के चुनाव के अवसर पर पहली बार विपक्ष ने जनता पार्टी के रूप में उभरकर सत्ता प्राप्त की। कालांतर में इस दल ने भी अपने को एक चुनावी गठबंधन सिद्ध कर दिया और बिखर कर पुन: कई दलों में विभक्त हो गया। 1988-89 में पुनः विपक्षी दलों को एक होने का अवसर मिला और कई दलों के विलयन के बाद जनता दल का गठन हुआ। 1989 में 142 सीटों पर से सफलता मिली। इसने अन्य दलों के सहयोग से केंद्र में सरकार का गठन किया। परंतु बाद में निराशा हाथ लगी और जनता दल को बिखरते देर नहीं लगी। अन्य दलों के सहयोग की बात तो दूर रही, जनता दल के तीन खंडों में विभाजित हो गया – राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) तथा जनता दल (सेक्यूलर)।

लोकतंत्र में विपक्षी party के कार्य भी सरकार से कम महत्वपूर्ण नहीं होते। चुनाव के बाद जब कोई politics party सत्ता में आ जाता है तब अगले चुनाव तक वह जनता के नियंत्रण से मुक्त हो जाता है। दो चुनाव के बीच सत्तारूढ़ दल पर अंकुश रखने की आवश्यकता पड़ती है। इस आवश्यकता की पूर्ति विपक्ष द्वारा ही संभव है। यदि लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल पर उचित नियंत्रण नहीं रखा जाए तो उसके तानाशाह बन जाने का भय बना रहता है। विपक्ष के सदस्य ही उसकी तानाशाही प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए रख सकते हैं। सरकार की आलोचना कर, सरकारी निर्णय के विरुद्धध आंदोलन एवं प्रदर्शन कर, मंत्रियों सेे प्रश्न पूछकर, सदन में कार्यस्थगन प्रस्ताव लाकर तथा आवश्यकताा पड़ने पर सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष सरकार को नियंत्रित करता रहता है। कानून के निर्माण में भी विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिकाा होती है। कानून बनने सेे पूर्व विधायिका में विधेयकों को कई स्तरों सेे गुजरना पड़ता है। विधेयकों की विपक्षी दलों द्वाराा आलोचना की जाती है। उनके उद्देश्योंों को चुनौती दी जाती है और आवश्यकता पड़ने पर विपक्षी दलों द्वारा उनमें संशोधन के प्रस्ताव भी प्रस्तुत किए जाते हैं। बजट पारित होने के समय भी विपक्षी party के सदस्य सरकार की जमकर आलोचना करते हैं और बजट में कटौती का प्रस्ताव भी पेश करते हैं।

विपक्षी दलों की आलोचना तथा नियंत्रण के अन्य साधनों के प्रयोग से सत्तारूढ़ दल सजग रहता है। उसे यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि उसके द्वारा कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जाएं जिनका लाभ उठाकर विपक्ष जनता को अपनेे पक्ष मैं कर ले। ऐसा होनेेेेेेेे पर उसे चुनाव में असफलता हाथ लग सकती है।

स्पष्ट है कि लोकतंत्र की रक्षा में विपक्ष एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार को सही मार्ग पर लाना ही विपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। जनता के शिकायतों को सरकार के सम्मुख रखना भी इनका कर्तव्य है। विपक्ष की भूमिका के भय से सत्तारूढ़ दल अपनी गलतियों को सुधारने के लिए विवश हो जाता है। लोकतंत्र में जनमत का महत्व बहुत अधिक होता है। विपक्ष सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर जनमत को अपने पक्ष में कर ले सकता है। इसका प्रभाव सत्तारूढ़ दल पर पड़े बिना नहीं रह सकता। लोकतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि विपक्ष सरकार के विरुद्ध सकारात्मक कदम भी उठाए, नकारात्मक नहीं।