सत्ता में भागीदारी का अर्थ क्या है (Power sharing)

सत्ता में भागीदारी प्रत्येक लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक आवश्यक और महत्वपूर्ण आधार है।लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता में भागीदारी का महत्व और भी अधिक इस कारण बढ़ जाता है, क्योंकि इसमें सत्ता में भागीदारी ही वह माध्यम है जिसके द्वारा जनता सरकार को अपनी सहमति देती या वापस लेती है। इस प्रकार, सरकार को उत्तरदाई बनाने में जनता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक समय था राजसत्ता में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति विद्यमान थी। प्रत्येक राज्य में राज होता कुछ थोड़े से लोगों के हाथ में सिमटी रहती थी।

सत्ता में भागीदारी
सत्ता में भागीदारी

आज विश्व के अधिकांश राज्य में इस दिशा में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सत्ता में विकेंद्रीकरण की प्रथा चल पड़ी है। यह तभी संभव है जब सत्ता में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो। इसी संदर्भ में Power sharing का अर्थ समझा जा सकता है। नागरिकों द्वारा सरकारी कामकाज में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेने की क्रिया को सत्ता में भागीदारी कहा जाता है। सत्ता में भागीदारी की एक अच्छी परिभाषा यह है- राज्य के नागरिकों द्वारा सरकारी स्तर पर निर्णय लेने या निर्णय निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करना सत्ता में भागीदारी है

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लोकतंत्र में सत्ता में भागीदारी की आवश्यकता क्यों है

शासन की सभी प्रणालियों में Power sharing की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। परंतु वर्तमान लोकतांत्रिक युग में इसकी अनिवार्यता और बढ़ गई है। power sharing की सीमित मात्रा भी लोकतंत्र के सफल संचालन में बहुत हद तक सहायक हुई है। विशाल जनता जनार्दन की सत्ता में भागीदारी का तात्पर्य राज्य के मामले में अधिकाधिक रुचि लेना है। सत्ता में भागीदारी राजनीतिक व्यवस्था को दृढ़ता प्रदान करते हैं। इससे राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व बढ़ जाता है। इसके अभाव में राज्य में क्रांति की संभावना बढ़ जाती है। विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच यदि सत्ता का समुचित विभाजन कर दिया जाता है, तब आपसी टकराव की संभावना क्षीण हो जाती है। सत्ता में भागीदारी एक प्रकार से जन समर्थन की कुंजी है। यही कारण है कि सभी प्रकार की शासन प्रणालीयों में सरकार के पक्ष में जन समर्थन जुटाने का प्रयास किया जाता है। किसी भी सरकार का यह प्रयास रहता है कि उसे आम जनता का विश्वास प्राप्त रहे। और जनता को ऐसा अवसर नहीं दिया जाए कि वह शासन के विरुद्ध ही बगावत कर दें। देश की एकता और अखंडता के लिए यह अत्यंत आवश्यक है की बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को शेष लोगों पर नहीं थोपा जाए। अत:, प्रत्येक शासन व्यवस्था का यह कर्तव्य होता है कि वह सत्ता के हित में अधिकाधिक जनता की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करें।

सत्ता में भागीदारी
सत्ता में भागीदारी

यह बात स्पष्ट है कि सत्ता में भागीदारी की आवश्यकता दो महत्वपूर्ण कारणों से हैं।

  1. देश की एकता और अखंडता के लिए जिससे राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व बना रहे।
  2. अधिक से अधिक लोगों तथा समूह को शासन व्यवस्था से जोड़ने के लिए जिससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो सकें।
Power sharing
Power sharing

सत्ता में भागीदारी की कार्यप्रणाली को समझें

विभिन्न लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता में भागीदारी के भी भिन्न भिन्न तरीके अपनाए जाते हैं। कुछ देशों के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया जा सकता है। सबसे पहले बेल्जियम का उदाहरण देते हैं। बेल्जियम यूरोप का एक छोटा सा लोकतांत्रिक राज्य है। इस राज्य की जनसंख्या लगभग एक करोड़ है। यहां मुख्यत: तीन तरह की भाषा बोलने वाले लोग हैं। बहुसंख्यक आबादी डच-भाषी है, उसके बाद फ्रेंच-भाषी लोग हैं, और जर्मन-भाषा बोलने वालों की संख्या लगभग 1% है। सत्ता में भागीदारी के प्रश्न पर तीनों भाषा बोलने वालों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रही। शासकों के सामने इस समस्या के समाधान की चुनौती सामने आई। बेल्जियम के शासकों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया और सत्ता में भागीदारी के प्रश्न को सहज ढंग से सुलझा लिया। इस उद्देश्य से संविधान में संशोधन कर यह व्यवस्था कर दी गई की

  • केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या बराबर रहेगी
  • देश की व्यवस्थापिका कोई विशेष कानून तभी बना सकती है। जब दोनों भाषाई समूह के सदस्य सदन में कानून के पक्ष में मतदान करेंगे। स्पष्ट है कि किसी एक भाषा के लोग संख्या में अधिक होने पर भी अपने पक्ष में फैसला नहीं ले सकेंगे।
  • संघीय व्यवस्था को गले लगाते हुए राज्य सरकारों को केंद्र की अपेक्षा सत्ता में अधिक भागीदारी दी गई है।
  • बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में एक अलग सरकार गठित की गई है। और इस सरकार में भी सत्ता में भागीदारी मैं केंद्र सरकार की तरह समानता के सिद्धांत को स्वीकार किया गया है। जबकि राजधानी में लगभग 80% फ्रेंच भाषी निवास करते हैं। और 20% ही डच भाषी रहते हैं।
  • सत्ता में भागीदारी को अधिक सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार राज्य सरकार तथा राजधानी की सरकार के अतिरिक्त यहां एक अन्य सरकार के चयन की भी व्यवस्था की गई है। इसका नाम सामुदायिक सरकार रखा गया है। अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों को अपनी सामुदायिक सरकार गठन करने का अधिकार दिया गया है। किसी विशेष भाषा को बोलने वाले लोग देश के चाहे किसी क्षेत्र में निवास करते हो उन्हें अपने समुदाय की सरकार का चयन करने का अधिकार प्राप्त है
सत्ता
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इन व्यवस्थाओं से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि Power sharing के क्षेत्र में बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यक अल्पसंख्यकों के बीच भेद समाप्त कर दिया गया है। और सभी लोगों को power sharing का समान अवसर प्रदान किया गया है। इतना ही नहीं विभिन्न भाषा भाषी लोगों के बीच सौहार्द लाने के उद्देश्य बेल्जियम के मर्चटेम नामक शहर के स्कूलों में फ्रेंच बोलने पर रोक लगा दी गई है। इससे डच भाषा में बोलने वाले लोगों को इस फ्लेमिश शहर के लोगों से जुड़ने में मदद मिलेगी। बेल्जियम के विपरीत एक एशियाई लोकतांत्रिक राज्य श्रीलंका में सत्ता में भागीदारी के प्रश्न पर भिन्न तरिका अपनाया गया है। यहां सत्ता में भागीदारी में बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों की अपेक्षा अधिक प्रश्रय दिया गया है। यह सर्वविदित है कि श्रीलंका के मूल निवासी सिंहली भाषा बोलने वाले बहुत संख्या के और तमिल भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यक। सभी क्षेत्रों में सिंहली-भाषियों को अधिक भागीदारी प्राप्त है और तमिल भाषियों के हितों को नजरअंदाज किया गया है। यही कारण है कि दोनों समुदायों के बीच निरंतर संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। सत्ता में भागीदारी के प्रश्न को लेकर ही श्रीलंका में गृहयुद्ध की स्थिति बनी रही है। अप्रैल 2009 में श्रीलंका की सरकार के विद्रोही संगठन लिट्टे के खिलााफ सैन्य कार्रवाई से स्थिति विस्फोटक हो गई थी। सैन्य कार्रवाई तो समाप्त हो चुकी है, परंतु इससे स्थिति सुधरने की आशा कम ही की जाा सकती है। जहां तक भारत का प्रश्न है, यहां सत्ताा में भागीदारी के प्रश्न पर भाषा, धर्म और समुदायों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं है। भारत में सत्ताा में भागीदारी के प्रश्न को अवसर की समानता केेे सिद्धांत को गलेे लगाकर सुलझा लिया गया है।

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सत्ता
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उपर्युक्त विवेचना इस बात को स्पष्ट करती है कि सत्ता में भागीदारी के क्षेत्र में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का भेदभाव बरतना आपसी तनाव को निमंत्रण देना है। भेदभाव के परिणाम स्वरुप ही श्रीलंका कि राष्ट्रीय एकता खतरे में रही है। भारत में राष्ट्रीय एकता अक्षुण्ण रहने का कारण सत्ता में भागीदारी के क्षेत्र में अवसर की समानता का सिद्धांत अपनाना है। बेल्जियम तो सत्ता में भागीदारी का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक बन गया है। श्रीलंका के विपरीत बेल्जियम में गृह युद्ध की आशंका पर विराम लग गया है और संपूर्ण विश्व में यह एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है। यही कारण है कि यूरोपीय संघ का मुख्यालय भी बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स ही बना हुआ है।

Power sharing के कितने रूप है

सत्ता में भागीदारी के चार रूप है।बहुत दिनों तक यही मान्यता रही है कि राजनीतिक सत्ता का विभाजन नहीं किया जा सकता है। इस मान्यता के पक्ष में यह तर्क दिया जाता रहा है कि राजसत्ता एक व्यक्ति अथवा कुछ थोड़े से लोगों के हाथ में सिमटी रहनी चाहिए और उस पर उनका ही वर्चस्व होना चाहिए। यदि या शक्ति कई स्तरों पर बिखर गई तो किसी निर्णय पर पहुंचना कठिन ही नहीं होगा, बल्कि निर्णय को लागू करने में भी कठिनाई होगी। परंतु, यह मान्यता आज के लोकतांत्रिक युग में स्वीकार्य नहीं है। इस मान्यता का स्थान सत्ता में भागीदारी की धारणा ने ले लिया है। आज के लोकतांत्रिक राज्य में शासकों की यह कोशिश रहती है कि राजनीतिक सत्ता में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी हो। आज यह स्वीकार किया जाने लगा है कि सत्ता में भागीदारी की मात्रा जितनी अधिक होगी, राजसत्ता को उतना ही अधिक स्थायित्व प्राप्त होगा। अच्छी शासन व्यवस्था भी वही मानी जाती है जिसमें अधिक से अधिक लोगों को Power sharing प्राप्त रहे। इसी आधार पर लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता में भागीदारी के भी कई रूप देखने को मिलते हैं। परंतु, मुख्यत: इसके 4 रूप होते हैं जिनका विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है

सत्ता
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  1. सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का विभाजन – विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका सरकार के तीन अंग होते हैं। किसी एक अंग में सत्ता केंद्रित नहीं कर के सरकार के तीनों अंगों के बीच जब सत्ता विभाजन कर दिया जाता है तब उसे शक्तियों का पृथक्करण (Separation of powers) कहते हैं। इससे किसी एक अंग के द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावना नहीं रहती है। एक ही स्तर पर रहकर सरकार के तीनों अंग अपनी-अपनी सत्ता का प्रयोग करते रहते हैं। इसी आधार पर इसे सत्ता का क्षैतिज विभाजन कहां जाता है। इस विभाजन से यह भी लाभ होता है कि सरकार का एक अंग दूसरे अंग की सत्ता पर अंकुश रखता है। इससे सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन बना रहता है। इसे नियंत्रण एवं संतुलन (checks and balances) की व्यवस्था कहते हैं। भारत के उदाहरण से और स्पष्ट किया जा सकता है। भारत में सरकार के तीन अंग है। तीनों के बीच power का बंटवारा कर दिया गया है। विधायिका का कार्य देश के शासन के लिए कानून बनाना है, कार्यपालिका का काम कानून को लाागू करना है, और न्यायपालिका का काम यह देखना है कि शासन कानून के अनुसार चल रहा है अथवा नहींंं ।अपने अपने कामों को संपन्न करने के क्रम में वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करनेेेे लग जाते हैं। इसी उद्देश्यय से ऐसी व्यवस्था कर दी गई हैै कि कोई अंग अपनी सत्ता का दुरुपयोग नहीं कर सके। कार्यपालिका अधिक शक्तिशाली है, परंतु सांसद उस पर अंकुश रखती है। संसद ही जनता की प्रतिनिधि संस्था है। यदि भारत की कार्यपालिका अर्थात मंत्री परिषद अपनी शक्ति का दुरुपयोोग करती है तो भारत विधायिका, अर्थात संसद को उसेेेेे हटाने का अधिकार है। इस प्रकार, संसद कार्यपालिका पर अंकुश रखती हैं। इसी प्रकार, न्यायपालिका का चयन कार्यपालिका द्वारा होता है। परंतु न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका दोनों पर अंकुश रखने का अधिकार है। विधायिका द्वारा बनेेेे कानून के लागू होने पर वह रोक लगा सकती है। स्वाभाविक हैै कि तीनों अंग अपने अपने निर्धारित क्षेत्रों में ही power का उपयोग कर सकते हैं
  2. विभिन्न स्तरों पर गठित सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन – किसी भी बड़े लोकतांत्रिक राज्य का शासन एक जगह से नहीं चलाया जा सकता है। सामान्यतः, शासन व्यवस्था को तीन स्तरों पर विभाजित किया जाता है, राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार, प्रांत स्तर पर राज्य सरकार तथा स्थानीय स्तर पर स्थानीय सरकार। power का विभिन्न स्तरों पर गठित सरकारों के बीच विभाजन कर दिया जाता है। भारत में भी दो स्तरों पर सरकार के गठन की व्यवस्था की गई है। केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार है। संविधान द्वारा केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन कर दिया गया है। इस उद्देश्य से तीन सूचियां बनाई गई है संघ सूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची। दोनों सरकारों के भी अतिरिक्त भारत में स्थानीय सरकारें भी है। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर नििगम, नगर परिषदें स्थानीय सरकार के संस्थाएं हैं। इन्हें भी power में भागीदारी का बनाया गया है। सत्ता मेंंं भागीदारी का यह रूप में भी कई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में देखने को मिलता है।
  3. विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता का विभाजन – किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में कितने समुदाय के लोग रहते हैं। धर्म जाति, भाषा इत्यादि के आधार पर इन्हें मुख्यत: दो वर्गों में बांटा जाता है – बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक। सत्ता का बंटवारा इस प्रकार किया जाता है कि अल्पसंख्यक समुदाय और व्यवसायिक समुदाय दोनों सत्ता में भागीदार रह सके। विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का विभाजन होने से आपसी एकता बनी रहती है। आपने पढ़ा कि इसी उद्देश्य बेल्जियम में सामुदायिक सरकार का गठन किया गया है। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में power का विभाजन किस तरह किया जाना चाहिए कि सभी लोग समझ सके कि शासन में उनकी भी भागीदारी है। भारत में इसी उद्देश्य अर्थ संख्याओं का आरक्षण दिया जाता है कि शासन में उनकी भी भागीदारी सुनिश्चित हो। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था इसी उद्देश्य से की जाती है।
  4. गैर सरकारी संस्थाओं में सत्ता का विभाजन – सत्ता के विभाजन का एक अन्य रूप भी देखने को मिलता है। गैर सरकारी संस्थाएं भी power में भागीदारी के लिए प्रयत्नशील रहती हैं। किसी भी देश में राजनीतिक दल, हित समूह, संघ तथा संगठन भी अपने प्रभाव से power में भागीदारी सुनिश्चित कर लेते हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच चुनावी दंगल द्वारा प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। स्वाभाविक रूप से सत्ता किसी एक दल में केंद्रित नहीं हो पाती है। समयानुसार, विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इस का हस्तांतरण होता रहता है। किसी एक दल का बहुमत नहीं आने पर कई दलों को मिलाकर गठबंधन सरकार का गठन किया जाता है। और सत्ता में भागीदारी का रूप बदल जाता है। विभिन्न पेशाओं और व्यापार से जुड़े लोग अपने अपने हित समूहों का गठन करते हैं। ऐसे समूह अपने अपने हितों की पूर्ति के लिए संघर्षरत रहते हैं। और अपना हित में निर्णय लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाए रखते हैं। स्वाभाविक है कि power में इन्हें भी भागीदार बनने का मौका प्राप्त हो जाता है।
सत्ता
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