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भलाई का ज़माना नहीं हैं भलाई न कर
मतलबी हैं लोग यहाँ अच्छाई न कर
ज़माना बड़ा ख़राब हैं एतबार न कर
मतलब परस्त हैं सब दूर रहा कर

प्यार मुहब्बत इश्क़ दोस्ती सब झूठ हैं
तू इन सब के चक्कर में न आया कर

मीठी मीठी बातें किसी की न सुनाकर
तू अपने कान बंद रखा कर

बातों से ठग लेते हैं लोग यहाँ
तू किसी की बातों में आया न कर

देखा हैं मैंने बहोतो की मदद कर के
कुछ नहीं मिलता मदद न किया कर

sad shayari for boys

जो चीज़ नहीं करनी थी वो तुमने कर दी
तुम्हें एतबार नहीं ये बात इशारे में कर दी

बहोत फ़िक्र बहोत इज़्ज़त थी तुम्हारी दिल में
लेक़िन तूमने आज वो ख़ुद ख़त्म कर दी

मुझसे कहते मैं कर देता बुरा लगा मुझे तुमने वो चीज़ मेरी पीठ पीछे क्यू कर दी

बेवजहा बेमतलब कर रहा था मैं तेरी मदद
तूने जो किया उसने दिल में चोट कर दी

तू सब जानता हैं मैं कैसा हूँ
फ़िर भी तूने गैरों के बहकावें में आकर वो चीज़ कर दी

sad shayari for boys

इरफ़ान को कोई गीला नहीं तुझसे दोस्त
लेक़िन जो इरफ़ान नहीं वो बात तूने कर दी

वो मुझे छोड़कर चला गया अफ़सोस क्यू करू
इतना ही उसका मेरा साथ था अफ़सोस क्यू करू

वो अपनी हालातों से मजबूर था
वो बेवफ़ा नहीं हैं तो फ़िर मैं अफ़सोस क्यू करू

अब वो कभी लौटकर नहीं आयेगा मेरे पास तो
मैं उसका इंतेज़ार क्यू करू

दुनियां में औऱ भी लोग हैं मुहब्बत करने को
वो गया तो क्या मैं मुहब्बत न करू

ये देखों फ़िर से बागों में फूल हैं खिले
वो आयेगा एक दिन मैं उसका इंतेज़ार क्यू करू

वो मुझसे दूर हैं ख़ुदा मुझे उस से मिला देगा तो
फ़िर मैं फ़िक्र क्यू करू

साक़ी सिगरेट ला के मैं ग़मगीन हु
मुतरिब रुबाब उठा के मैं उदास हु

रुक रुक के तार छेड़ के मैं बेबस हु
थम थम के मय पीला के नशे में हु

तेरी रौशनी मेरी आँखों मे चुभ रही हैं
ए चाँद तू चला के मैं उदास हु

मुझसे नजरे न फेर के बरहम हैं ज़िन्दगी
आँखो से आँख मिला के मैं नाराज़ हु

तेरे चहेरे को देखकर शायद बहल जाये दिल मेरा
साक़ी मुस्कुरा के मैं उदास हु

तेरा आना ही हैं मेरे ग़म का इलाज़
चल अब तू आ जा के मैं उदास हु

मैंने कभी कोई ज़िद नही की तुझसे
ए महजबीं न जा के मैं ग़मगीन हु

इमशब का कोई नहीं हैं महल यहाँ
आग़ोश में आ के मैं उदास हु

सुकूत से औऱ बढ़ रहा हैं गम मेरा
किस्सा कोई सुनाओ मैं ग़मगीन हु

इसी से होगा अब मेरे ग़म का इलाज़
मैं भूल जाता हु के मैं उदास हु

साक़ी:-sweetheart
मुतरिब:-singer रुबाब:-musical instrument
बरहम:-angery महजबीं:-mone like forehead
इमशब:-tonight सुकूत:-silent

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होंठो ने तेरा ज़िक्र न किया पर मेरी आंखे तुझे पैग़ाम.देती है…!!

हम दुनियाँ’ से तुझे छुपाएँ कैसे मेरी हर शायरी तेरा ही नाम लेती है…!!

sad shayari for boys

मैं ये तो नही कहता के मुझे गम नही
पर सबब-ए-ग़म मैं कहता नही

मैं देखता हूं उस बेवफ़ा को किसी
औऱ के साथ
लेक़िन मैं उसे बेवफ़ा कहता नहीं

रुसवा किया उसने मुझे शहर में
घूम घूम कर
आँखे हैं नम लेक़िन मैं उसे
कुछ कहता नही

क्या पूछता हैं तू मुझसे आ कर
सितम ग़र जो तूने किया वो मैं
किसी को कहता नहीं

सब्र हैं हमें तुम्हारी तल्ख़ कलामी पे
ज़हर पीते हैं लेक़िन ज़हर कहता नहीं

कोई आये या न आये
मेरी शान में कमी नहीं आयेगी
मैं पहेले भी नवाब था
अब भी नवाब हु
ये नवाबी नहीं जायेगी

“हुनर” होगा तो दुनिया कदर करेगी
“एड़ियाँ” उठाने से किरदार ऊँचे नही होते..

        सुप्रभात

sad shayari for boys

ज़रूरी नहीं हैं इश्क़ बाहों के सहारे ही मिले,
किसी को जी भर के महसूस करना भी मोहब्बत हैं।।

🌼🌼
शब्दों को होठों पर रखकर, दिल के भेद ना खोलो…
मैं आँखों से ही सुन लेता हूँ, तुम आँखों से ही बोलो…!!
🌼🌼

मैं हारा हुआ खिलाड़ी हूं
फिर मैदान मे आया हूं
अल्फाजो की जो रानी है
मैं उसका राजा बनने आया हूं
जीत लो मुझे मैं अब जालना
छोड़,तुम्हारे शहर आया हूं

तुम भी मोहब्बत के सौदे बडे अजीब करते हो…
बस यूँ निगाहों से मुस्कुराते हो और दिल खरीद लेते हो…🌹🌹🌹

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बस यही कह कर टांके लगा दिए उस हकीम ने
कि, जो अंदर से बिखरा है उसे खुदा भी नहीं समेट सकता।

नुक्स हमारे उसे नज़र आने लगे हैं
वो अब किसी औऱ के होने लगे हैं

न पा कर उसे हम बेचैन रहने लगे हैं
इश्क़ में हमें भी क्या जख़्म लगे हैं

वही शहर वही रास्ता वही गली
अब हमारा दिल यहाँ कैसे लगे हैं

राह चलते हैं तो होता हैं ये गुमाँ
हम ये किस राह पर चलने लगे हैं

बदल गया वो बदल गया ज़माना
वक़्त के साथ किस्से उसके पुराने होने लगे हैं

मिज़ाज़ बदल चुका हैं अब हमारा
लोग अब हमें छोड़कर जाने लगे हैं

sad shayari for boys

कई तरीके होते हैं कुछ कहने के…!!
उनमें से एक तरीका है कुछ ना कहना…!!

वो बातें तिरी वो फ़साने तिरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तिरे

बस इक दाग़-ए-सज्दा मिरी काएनात
जबीनें तिरी आस्ताने तिरे

मज़ालिम तिरे आफ़ियत-आफ़रीं
मरासिम सुहाने सुहाने तिरे

फ़क़ीरों की झोली न होगी तही
हैं भरपूर जब तक ख़ज़ाने तिरे

दिलों को जराहत का लुत्फ़ आ गया
लगे हैं कुछ ऐसे निशाने तिरे

असीरों की दौलत असीरी का ग़म
नए दाम तेरे पुराने तिरे

बस इक ज़ख़्म-ए-नज़्ज़ारा हिस्सा मिरा
बहारें तिरी आशियाने तिरे

फ़क़ीरों का जमघट घड़ी-दो-घड़ी
शराबें तिरी बादा-ख़ाने तिरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तिरे

बहार ओ ख़िज़ाँ कम-निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तिरे

‘अदम’ भी है तेरा हिकायत-कदा
कहाँ तक गए हैं फ़साने तिरे

मय-कदा था चाँदनी थी मैं न था
इक मुजस्सम बे-ख़ुदी थी मैं न था

इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था

तूर पर छेड़ा था जिस ने आप को
वो मिरी दीवानगी थी मैं न था

वो हसीं बैठा था जब मेरे क़रीब
लज़्ज़त-हम-सायगी थी मैं न था

मय-कदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तिश्नगी थी मैं न था

थी हक़ीक़त कुछ मिरी तो इस क़दर
उस हसीं की दिल-लगी थी मैं न था

मैं और उस ग़ुंचा-दहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था

जिस ने मह-पारों के दिल पिघला दिए
वो तो मेरी शाएरी थी मैं न था

गेसुओं के साए में आराम-कश
सर-बरहना ज़िंदगी थी मैं न था

दैर ओ काबा में ‘अदम’ हैरत-फ़रोश
दो-जहाँ की बद-ज़नी थी मैं न था

sad shayari for boys

दिल से पूछो तो आज भी तुम मेरे ही हो
ये ओर बात है कि किस्मत दगा कर गयी।😔
पानी से प्यास न बुझी
तो मयखाने की तरफ चल दिए

धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का
उठा नहीं है अभी ए’तिबार नालों का

ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना
ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का

ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े
पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का

न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़
यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का

लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से
बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

तिरी अंजुमन में ज़ालिम अजब एहतिमाम देखा
कहीं ज़िंदगी की बारिश कहीं क़त्ल-ए-आम देखा

मेरी अर्ज़-ए-शौक़ पढ़ लें ये कहाँ उन्हें गवारा
वहीं चाक कर दिया ख़त जहाँ मेरा नाम देखा

बड़ी मिन्नतों से आ कर वो मुझे मना रहे हैं
मैं बचा रहा हूँ दामन मिरा इंतिक़ाम देखा

ऐ ‘इरफ़ान’ रूह-परवर तिरी बे-ख़ुदी के नग़्मे
मगर आज तक न हम ने तिरे लब पे जाम देखा

और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा है
आज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रखा है

वो राज़ की बात मुझे कहेने आया था
वो अपनी शादी का कार्ड मुझे देने आया था

शायरी नहीं बस इतना सुन लो
मैं तन्हा बहुत हूँ और वजह तुम हो

बहेतरीन से बहेतरीन लिखता हूँ
तू पढ़ तुझे बेवफ़ा लिखता हूँ

तेरे ज़ुल्म सितम लिखता हूँ
तू पढ़ तुझे ज़ालिम लिखता हूँ

अपनी वफ़ा की कहानियां लिखता हूँ
तू पढ़ तेरी बेवफ़ाईया लिखता हूँ

दर्द ग़म तक़लीफ़ सितम की दास्तां लिखता हूँ
तू पढ़ तुझे सितमगर लिखता हूँ

हर लफ़्ज का अंदाज बदलकर लिखता हूँ
तू पढ़ तेरे बदलने की वजहा लिखता हूँ

इरफ़ान अपनी तन्हाई के बारे में लिखता हैं
तू पढ़ तन्हाई की वजहा तुझे लिखता हूँ

मुझसे दूर जाया न करो गैरों की तरहा
मैंने तुम्हें चाहा हैं अपनों की तरहा

खुद-ब-ख़ुद खिंचा चला आता हूँ मैं
जैसे तू हो किसी चिम्बक की तरहा

औऱ इस से ज़्यादा मुहब्बत क्या करें
तेरा इंतेज़ार करते हैं दीवानों की तरहा

जुस्तजू ने तेरी हमें मंज़िल पर रुकने न दिया
हम भटकते रहे आवारों की तरहा

तेरा प्यार जिसे मिला वो खुशनसीब हैं
हमारी मुहब्बत नाक़ाम रहीं मजनूं की तरहा

मैं जानता हूँ तुम अभी ख़फा हो मुझसे
तुम्हारी आँखों ने सब कुछ कहा हैं मुझसे

तुझे कोसू के दुआए दु समझ नहीं आता
तूने मेरी हर ख़ुशी छीन ली मुझसे

दिल का ये हाल हैं के तुझे याद करता हैं
ऐसा लगता हैं के कोई जुर्म हुआ मुझसे

खो गया न जाने अब तू कहा
लोग अब तेरे बारे में पूछ रहे हैं मुझसे

जिसने दिए जख़्म मैंने उसे दुआ दी
इश्क़ की यहीं हैं रस्म मैंने पूरी कर दी

दिल का ये हाल हुआ उसके ग़म में
हमनें ख़्वाहिशों की कब्र दिल में बना दी

इसी रौशन दान से सहर की रौशनी होंगी
हमनें रौशन दान के लिए भी दुआ कर दी

चुभते हैं दिल में काटो की तरहा बातें उस की हमनें उसके पीछे की वक़्त बर्बादी

हमसें पूछो इश्क़ क्या हैं इश्क़ फ़न क्या हैं
हमनें उसे ज़िन्दगी भर ख़ुश रहने की दुआ दी

sad shayari for boys

इश्क़ से अब मुकरने लगा हूँ मैं
संभालो मुझे हद्द से गुजरने लगा हूँ मैं

पहेले हक़ीक़तों से मतलब था मुझे
अब ख्वाबों में जीने लगा हूँ मैं

उसने तोड़ दिये मुहब्बत के अक़ीदे
लगता हैं अब बिखरने लगा हूँ मैं

लौट के आना अब मेरा मुहाल हैं
ये कमाल तेरा हैं बिगड़ने लगा हूँ मैं

चाँद सितारों ज़मी ओ आसमान चले जाओ के अब मुहब्बत का दुश्मन बनने लगा हूँ मैं

खो गयी इरफ़ान की ख़ुश मिज़ाजी
अब उदास गलियों से गुजरने लगा हूँ मैं

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है,
कि हिस्सा इश्क़ में किस का बड़ा है..!!

हर इक दिल में ग़म छुपा हैं
ये इश्क़ नहीं बद-दुआ हैं

वफ़ा-ए-उम्मीद कहा हैं
दिल में इक दर्द छुपा हैं

आँखो में अश्क छुपा हैं
कानो में आमद-ए-पा रखा हैं

नींद को आँखो से दूर रखा हैं
तमाम रात जाग के रखा हैं

उसके खयालों में लगा के रखा हैं
वो बात नहीं करती बुरा लगा हैं

अज़नबी सा बना के रखा हैं
शहर वालों से दूर कर के रखा हैं

वक़्त की रफ़्तार ने क्या क्या दिखा रखा हैं
दिल मे इक खौफ़ सा बना के रखा हैं

वजूद बिखर के रखा हैं
हर एक फ़र्द से दूर कर के रखा हैं

हर एक बात का हिसाब लिख रखा हैं
अब उसने फ़ासला बना के रखा हैं

हर एक बात की कशिश लगा के रखा हैं
ज़माने को बहका के रखा हैं

कभी तो बैठो मेरे पास
तुझे दिल-ए-हाल सुनाना चाहती हूँ ,

जो भी गुजरी है इस दिल पर
तुमसे दूर होकर
‘नियती’ का दर्द महसूस कराना चाहती हूँ

तुझे भी तकलीफ हो मेरे नाखुश होने से
तेरे दिल में वो जगह बनाना चाहती हूँ

आओ मेरे पास
मेरा हाल तो पूछो,
तुम्हें अपना हमदर्द बनाना चाहती हूँ

छोड़ो न ये लड़ना झगड़ना, रूठना मनाना ,
मेरी जिंदगी में आओ
तुम्हें दिल का अस्हाब बनाना चाहती हूँ
मेरी jaaan मैं बस तुम्हारी होना चाहती हूँ ।

खत्म कर दी मैंने उनसे सारी नाराजगी …….
क्योंकि नाराज अपनों से हुआ करते हैं गैरो से नहीं …💔💔

ज़िंदगी तुझे अब सवारना हैं
जो कर्ज़ तेरा हैं उतारना हैं

दिल को छू जाती हैं आवाज़ किसी की
ऐसा लगता हैं तूने पुकारा हैं

पलकों पर आ जाती हैं अश्कों की लकीरें
ऐसा लगता हैं तेरे आँचल का किनारा हैं

ज़िंदगी इक ख़लिश दे के ना जा मुझ को
ऐसा दर्द दे जो गवारा नही हैं

ज़िंदगी तुझ को भुला दिया हैं
वक़्त तेरी बातों में गवा दिया हैं

नेकी अब गुनाह लगतीं हैं
तेरे ऐबो को छुपा दिया हैं

तूमने ही इस दिल को दिखाया हैं
अपना दिल अपने आप नही दुखता हैं

मुद्दतों तर्क-ए-तमन्ना पर रोया हैं
तेरे इश्क़ का कर्ज़ उतार दिया हैं

sad shayari for boys

ओ शायद किसी महँगे खिलौने सी थी
मैं बेबस बच्चा सा मैं उसे देखता ही रह गया…💯❤️

इधर उधर से ना रोज यूँ तोड़िये हमको,
अगर खराब बहुत हैं तो छोड़िये हमको..!!

फिर आया हूँ, दर्द, दिल और मोहब्बत की बात करने,
मैं दीवाना नहीं, बस दीवानों की जुबां लिखता हूं.।

तुम्हारे दूर ….रहने से हमें तकलीफ होती है,….
आज इतना करीब आ जाओ …….की हम बहक जाये….💞

सिगरेट, शराब, जाम, बस यही सामान होता है !
‌‌‍‌‌जिससे किसी को भुलाना बहुत आसान होता है !
मेरी सलाह मानो तो तुम मोहब्बत से दूर ही रहना,
किसी को अपना मानकर बड़ा नुक़सान होता है !!

चलते चलते अक्सर ठहर जाती होगी वो ।
अकेले में तो काफी डर जाती होगी वो ।

और वो लोग तो हवा में उड़ने लगते होंगे
जिनकी गलियों से गुजर जाती होगी वो ।

ये सब लोग बस उसी के दीवाने क्यों हैं
ज़रूर कुछ ना कुछ कर जाती होगी वो ।

दवा,दर्द,चमक,महक,नशा,खुशबू आ जाए ।
न कोई गुलाब न कोई शराब बस एक तू आ जाए ।

आज वो रुखसती का समाँ याद आ गया
वो शहर वो कुचा वो मकान याद आ गया

जख़्म उभर कर हरा हो गया
दर्द जो तूने दिया था वो याद आ गया

शौक़ जो दिल में था वो कब का भूल गए
आज तेरी बेरुख़ी का पल याद आ गया

सुलगती हुई आँखो की वहशत में
देखा जो ख़्वाब था वो याद आ गया

माना कि हम इजहार नहीं करते,
मतलब ये नहीं कि आपका खयाल नहीं करते,
कितनी बेकरारी में गुजरता है वो दिन
जिस दिन हम आपसे बात नहीं करते,

मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए
बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए

रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल
मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए

नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह
ग़ज़ल ने सीखे हैं अंदाज़ सब तुम्हारी तरह

जो प्यास तेज़ हो तो रेत भी है चादर-ए-आब
दिखाई दूर से देते हैं सब तुम्हारी तरह

बुला रहा है ज़माना मगर तरसता हूँ
कोई पुकारे मुझे बे-सबब तुम्हारी तरह

हवा की तरह मैं बे-ताब हूँ कि
शाख़-ए-गुलाब
लहकती है मिरी आहट पे अब तुम्हारी तरह

मिसाल-ए-वक़्त में तस्वीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम हूँ अब
मिरे वजूद पे छाई है शब तुम्हारी तरह

सुनाते हैं मुझे ख़्वाबों की दास्ताँ अक्सर
कहानियों के पुर-असरार लब तुम्हारी तरह

sad shayari for boys

जब एक इंसान की आदत हो जाए…
तो उसके बगैर रहना मुश्किल होता है…

क्या ख़बर थी की उस से मुहब्ब्त हो जायेगी
हमें तो बस उसका मुस्कुराना अच्छा लगा था

तू क़रीब आए तो बात करूँ
आईना सामने रख दीदार करूँ

सामने अपनी हार क़ुबूल करूँ
अकेले में तेरी जीत से इन्कार करूँ

तुझे सोचू तेरी तस्वीर देखू
फ़िर उसी से हँसकर बातें करूँ

मेरी क़ाबू में कुछ भी नहीं
तेरी याद आती हैं मैं क्या करूँ

रात होते ही टूट जाती हैं दीवार
जिसे मैं दिन में तामीर करूँ

आज उसे नज़दीक से देखा हैं
आज वो मेरे क़रीब से गुज़रा हैं

आज कमरे को अँधेरे से भरा हैं
आज उसके बारे में गौर से सोचा हैं

उसकी हर चीज़ को हमनें चाहा हैं
तब जा कर वो प्यार करने आया हैं

न गीला न शिक़वा न शिक़ायत हैं
हमें तो उस से बेपनाह मुहब्बत हैं

वो आ कर मुझसे इस तरहा मिला हैं
जैसे बरसों पहेले मुझसे बिछड़ा हैं

कोई मेरा नहीं था न कोई अपना था
जब उसने आ कर अब हाथ थामा हैं

दुखी दिलों में, दुखी साथियों में रहते थे
ये और बात कि हम मुस्कुरा भी लेते थे

वो एक शख़्स बुराई पे तुल गया तो चलो
सवाल ये है कि हम भी कहाँ फ़रिश्ते थे

और अब न आँख न आँसू न धड़कनें दिल में
तुम्ही कहो कि ये दरिया कभी उतरते थे

जुदाइयों की घड़ी नक़्श नक़्श बोलती है
वो बर्फ़-बार हवा थी, वो दाँत बजते थे

अब इन की गूँज यहाँ तक सुनाई देती है
वो क़हक़हे जो तिरी अंजुमन में लगते थे

वो एक दिन कि मोहब्बत का दिन कहें जिस को
कि आग थी न तपिश बस सुलगते जाते थे

कहाँ वो ज़ब्त के दा’वे कहाँ ये हम ‘इरफ़ान’
कि टूटते थे न फिर टूट कर बिखरते थे

तुझसे मुहब्बत करने वाले बहोत होगें
लेक़िन तेरी महफ़िल में हम नहीं होगें

मैं सोचता हूँ गुल कब तक खिले रहेगें
किसी न किसी दिन मुरझा हुए होंगे

बड़ी देर बाद तूने नज़रे करम की डाली
शायद तुझे मुहब्बत के दिन याद आये होगें

रिश्ता हमारा यू ही उलझता जायेगा
तुम किस से मशवरा क्यू नहीं लेते होगें

आज उन्हें इस तरहा देखा
इक नज़र में जी भरकर देखा

दिल बेताब हैं दिल का मुक्कदर हैं
जिस क़दर थी हमें तौफ़ीक़-ए-नज़र देखा

हम कदमों की आहट जान लेते हैं
ज़िंदगी तुझे दूर से पहचान लेते हैं

नज़र तेज़ औऱ क़ातिलाना सी हैं
नज़र मिलते ही जान लेते हैं

जिसे कहती हैं दुनियां क़ामयाबी
उसे इंसा कीमतों पर ख़रीद लेते हैं

तेरी मिठी मिठी बातों का क्या कहना
तेरी हर बात एहतियातन छान लेते हैं

दिल घबराता हैं मेरा सुनसाम रातों में
ऐसे में तेरी यादों को गले लगा लेते हैं

कोई सौदा भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं
इस तर्क-ए-मुहब्बत का भरोसा भी नहीं

अपनी गिनती न यगानो में न बेगानों में
वो जल्वा-ए-महफ़िल से उठाता भी नहीं

मुहब्बत को महेरबानी नहीं कहतें हैं ज़ाना
आह, मुझे अब ये रंजिश पसंद भी नहीं

एक ज़माना हुआ तू भी न आया हमें ज़ाना
औऱ हम तुझे भूल गये ऐसा भी नहीं

आज गफ़लत आँखो में हैं पहले से ज़्यादा
पर हम ख़ातिर-ए-बीमार शकेबा भी नहीं

अरे,हम ही गुल हैं हम ही गुलज़ार हैं ज़ाना
लेक़िन तूने जो कहा वो हमनें सुना भी नहीं

हाय ये मजमा ये अहबाब ये बज़्म ख़ामोशी
आज महफ़िल में इरफ़ान आया भी नहीं

ये सच हैं की तू मुहब्बत पर नहीं मजबूर
ये भी सच हैं के तू इतना अच्छा भी नहीं

sad shayari for boys

शायर से मुहब्बत जी का जंजाल हैं
हर लफ़्ज पर तारीफ़ ये भी कमाल हैं

शायर से बेवफ़ाई ये भी जी का जंजाल हैं
हर लफ़्ज पर तंज ये बड़ा कमला हैं

अपना बना लो जाँ लुटा देता हैं
दुश्मनी में परखच्चे उड़ा देता हैं

यू न छेड़ो सारे बज़्म में तुम हमें
नाम लिये बिन शेर भी कहता हैं

हल्के में न लिया करो किसी भी शायर को
दो लफ्ज़ो से जान भी ले लेता हैं

हुरूफ़ अल्फ़ाज़ लफ़्ज सब गुलाम हैं
कलम जिस तरफ मोड़े चल देते हैं

खामोशी का अपना मज़ा हैं लब्ज कोई बहरा नहीं देखा जाता,
तेरी आंखों पर काजल की गिरफ्त तो ठीक थी।
ये आसुओं का पहरा नहीं देखा जाता।
अपने हिस्से की खुशियां लूटा दू तुझ पर,
तेरा उतरा हुआ चेहरा नहीं देखा जाता।।

वो अपनों से उलझता जा रहा हैं
दिल ही दिल में घबराता जा रहा हैं

वो बातों से अपनी सबकों बहला रहा हैं
वो झूठी बातें कर के सब को समझा रहा हैं

हक़ीक़त खुल गयी हैं अब उसकी
वो अब बस धोखे पे धोखे दे रहा हैं

मुमकिन हो तो कर लो सामना
ख़बर हैं उसे कारवा आ रहा हैं

हद्द औऱ सरहदों को बंद कर रहा हैं
वो जुल्म ओ सितम की इन्तेहा कर रहा हैं

ख़बर हैं उसे उखड़ जायेंगे उसके पाँव
वो अपने हाथों से अपनी क़ब्र खोद रहा हैं

वहशत तारी हैं उसके दिल दिमाग़ पर
वो अब अंदर ही अंदर घूट रहा हैं

भरम जो था सियासत का टूट चुका हैं
वो अब ख़ुद ही से नज़र छुपा रहा हैं

उन्हीं से आबाद हैं रोशनी हैं घर हमारा
जिनके उपर वो चिंगारियां बरसा रहा हैं

जो उनकी आँखें देख नही सकती हैं
वो सब धोखे उन्हें दे रहा हैं

महसूस उसे हुआ के पहलू कमज़ोर हैं
अब वो सबकी नजरों से उतर रहा हैं

ज़ोर अपना हर तरीक़े से आझमा रहा हैं
वो सब तरफ़ निगाह अपनी फेर रहा हैं

सुलझी हुई चीज़ को उलझाता जा रहा हैं
वो अपनों से उलझता जा रहा हैं

ऐसा हैं के सब को अपनी पड़ी हैं
यहाँ तो सब की फटी पड़ी हैं

बेगानों से मिल रही हैं तसल्ली
अपनों ने उछाली पगड़ी हैं

न जाने किस बात का डर उन्हें हैं
लगता हैं सिने में जिगरा नहीं हैं

पर्दे पर ही अपनी हिम्मत दिखाते हैं
क़भी सिंघम तो क़भी सिंघ बन जाते हैं

क्या सिख ले औऱ क्यू देखें हम इन्हें
ये तो गिरगिट की तरहा रंग बदलतें हैं

न किसी के थे न किसी के होंगे क़भी
ये तो जिधर पलड़ा भारी उधर झुक जाते हैं

sad shayari for boys
sad shayari for boys

सही प्रशंसा व्यक्ति का हौसला बढ़ती
है…
अधिक प्रशंसा व्यक्ति को लापरवाह
बनाती है..!!

ख्वाइशों को मरने नही देता
वो शख्श मुझे किसी और का होने नही देता
रूठूँ तो मना लेता हैं
वो शख्श मुझे नाराज़ होने नही देता

इरफ़ान अपनी नाकामी का मातम न कर
चला गया हैं अब वो दौर तू ग़म न कर

औऱ भी तरीके हैं दर्द-ए-दिल बयां करने के
तू मुस्कुराती आँखो अश्क़-ए-बार न कर

हा कुछ हवादिस हुए कुछ बातें हुईं हैं
लेक़िन तू ख़ुद को तबाह-ओ-बर्बाद न कर

तुम तो खुशमिज़ाज हो अहले-महफ़िल से तुम्हें क्या करना
बरहम हो गयीं हैं ज़िंदगी तो क्या तू कोई ग़म न कर

ये तो फ़ितरत हैं ज़िंदगी की चढ़ उतार हैं
रास्ता भले ही न मिले तुझे पर तु मातम न कर

इश्क़ मुहब्बत अदना सा फ़साना हैं
समेट ले दिल आशिक़ तुझे जाना हैं

किसी की यादें हैं ये किसी की बातें हैं
आँखो में अश्क़ हैं या मोती पिरोये हैं

ये दुश्मन हैं वफ़ा के ये बात कहा मानें
सब इनकी शरारत हैं सब इनके बहाने हैं

तू शायर हैं तू शायर रहेगा तेरा ज़माना हैं
फ़ितरत तेरी तू ख़ुद ही ख़ुद का आईना हैं

तुझ पर जो गुजरी हैं वो किस ने जाना हैं
तेरी दर्द ग़म तक़लीफ़ तेरा ही फ़साना हैं

न हुस्न ने तुझे समझा न इश्क़ ने जाना हैं
वो तो ख़ाक हैं तेरी ठोकरों में ज़माना हैं

न मुहब्बत न किसी का आना न जाना हैं
आँखो में अश्क़ हैं ग़मो का फ़साना हैं

यू मेरी तरफ़ न देख ग़ज़ल लिख रहा हूँ
मैं लफ़्ज लफ़्ज तेरे बारे में लिख रहा हूँ

दिन भर का थका हारा शब का जागा हूँ
ज़रा ठहर जा के शब तेरे साथ बिताता हूँ

आसमा चाँद सीतरे सब मेरे ग़ुलाम हुए हैं
नोचकर सीतरे तेरे लिये बालिया बनाता हूँ

किसी औऱ न बाट देना किसी को न देना
जो तुझे दिया हैं किसी को देता नहीं हूँ

न अज़नबी हैं न रहगुज़र हू मैं इऱफान हूँ
यू न निगाहें फेर मुझसे मैं तो तेरा अपना हूँ

तूने मुझे मजनूं बना रखा हैं
मुझे अपने हाथों में रखा हैं

तेरा असर मुझ पे हुआ हैं
नाम तेरा मैंने मुहब्बत रखा हैं

तुम बरसते क्यू हो इस तरहा
मैंने तो तुम्हें अपना मान रखा हैं

मेरी आँखें अब तुझे देखना चाहे
तूने मुझे दीवाना बना रखा हैं

पी गया तेरे ओठो के जाम इरफ़ान
तेरी सोहबत में बड़ा मज़ा रखा हैं

मुतरीब रुबाब उठा के जाना हैं
तू न पूछ के हमें कहा जाना हैं

महफ़िल देखकर चौक न जाना
हमें तो बस ग़ज़ल सुनानी हैं

साथ ले ही ले तू क़िताब मेरी
आज पुरानी ग़ज़ल हमें गानी हैं

देख मुझे अपनी बात बतानी हैं
किया जो उसने वो सितम बताना हैं

ख़याल रहे के टूटे न दिल किस का
तुझे तार थम थम के छेड़ने हैं

सुन ग़र आपे से बाहर हो जाये इरफ़ान
तो तुझे मुझे संभालना भी हैं

वो हमसफ़र हमनशीं हैं मुहब्बत करनी होंगी
दिल उन्हें दिया दिल की धड़कन भी नाम करनी होंगी

वो जानतें हैं बख़ूबी हाल-ए-दिल मेरा
अब तो हमें उनसे नजदीकियां बढ़ानी होंगी

हमारे दरमियां अब नहीं हैं कोई भी फ़ासला
अब तो हमें रगबते उनसे बढ़ानी होंगी

बुलाया जाए कैसे अब उन्हें अपने क़रीब
हमें तो अब शेर-ओ-शायरी करनी होंगी

इक मुद्दत से वो हँसना भूल बैठें हैं
अब इरफ़ान को उन्हें गुदगुदी करनी होंगी

सफ़र-ए-ज़िंदगी में हमसें अपना छूट गया
अब किस पर करें नाज़ वो शख्श छूट गया

साक़ी के हाथ था जाम वो अब छूट गया
रेज़ा रेज़ा बिखर गया मैं हाथ से छूट गया

न दिल को सुकून हैं न ग़म नाकामी का हैं
हाथ जिसका पकड़ा था हाथ वो छूट गया

सोचा था नग्मा उसके साथ गुनगुनायेंगे हम
नग्मा लिखा न गया साथ उसका छूट गया

कौनसी शय थी वो के नज़र ना आयी हमें
फ़िज़ा दरख़्त उड़ा गयीं सूखा पता छूट गया

इस सफ़र-ए-ज़िंदगी में टूटा हैं दिल मेरा
इक तार जो जुदा था मुझसे अब वो छूट गया

ईलाही तू ये दर्द ग़म दूर कर दे
कल जो गुजरनी हैं आज गुजार दे

तमाम उम्र रहे हैं काटो के साए में
अब तो तू मेरा दामन फूलों से भर दे

ज़माना इरफ़ान से हो चूका हैं मायूस
तू ऐसा कर के सब को मेरा दीवाना कर दे

जो हुआ हैं पहेले उसे जाने दे
अब तू नए से जिंदगी सवार दे

निगाहें करम तू निगाह इरफ़ान की तरफ़ कर दे
बस तू एक बार कुन फ़या कुन कह दे

मुहब्बत का एहसास मिटा दे
अब तू मुझे मौत की सज़ा दे

यादों को मिरी दिल से मिटा दे
होश में हूँ मैं तू दीवाना बना दे

सुनता नहीं तू दिल की आवाज़
अब तुझे कैसे सदाए हम दे

आज नहीं तुझसे वफ़ा की उम्मीद
अब तू मुझे आँखे से उतार दे

मेरा मांझी अब मुझे याद नहीं हैं
मैं कहाँ हूँ तू मुझे इतना बता दे

तुम्हीं ने की हैं मिरी दुनियां तबाह
अब मुझे इस दौर का मजनूं बना दे

तौबा की हैं अब इरफ़ान ने मुहब्बत से
ऐसा कर के अब तू कोई भी सज़ा दे दे

जो हँस हँस के हम बात करे रहे हैं
हम तो इक ग़म को याद कर रहे हैं

किनारा था कोई मिरी कश्ती का
हम बस उस साहिल को याद कर रहे हैं

जो जो हम उस राह से गुज़र रहे हैं
हर शय में उसको तलाश कर रहे हैं

गुज़रा जो हू मैं उस गली मोहल्ले से
तेरा नाम ले ले के तुझे याद कर रहे हैं

ख़ुदा तुझे सलामत रखें फूल बना के रखें
हम तो तेरे लिए यही दुआ कर रहे हैं

दिल से क़भी नहीं जाएगी तिरी मुहब्बत
हम तो बस मुहब्बत का हक़्क़ अदा कर रहे हैं

इरफ़ान का वो साहिल वो किनारा डूब गया
अब तो उसे देखने की दुआ कर रहे हैं

ज़रा जिसकी वफ़ा का हमें यकीं आया
ख़ुदा क़सम उस से ही हमने धोखा खाया

रौशनी लेने चले थे और अंधेरे में आ गए
मुस्कुरा भी न पाए थे कि आँखो आँसू आ गए

आज वो मुझ को देख कर कतरा गए
अल्लाह अल्लाह अब मुहब्बत में ये दिन भी आ गए

जब भी आया है उस को भूल जाने का ख़याल
यक-ब-यक आवाज़ आई लीजिए हम आ गए

आह वो मंज़िल जो मेरी ग़फ़लतों से गुम हुई
हाए वो रहबर जो मुझ को राह से भटका गए

फिर ये रह रह कर किसी की याद तड़पाती है क्यूँ
अब तो हम तर्क-ए-मोहब्बत की क़सम भी खा गए

देख कर उन की निगाह-ए-लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद
क्या बताएँ क्या ख़याल आया कि आँसू आ गए

उन के ही क़दमों की आहट रात भर आती रही
दिल की हर धड़कन पे हम समझे कि वो ख़ुद आ गए

अब कोई दैर ओ हरम से भी सदा आती नहीं
हम तिरी धुन में ख़ुदा जाने कहाँ तक आ गए

sad shayari for boys
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तिरा जल्वा निहायत दिल-नशीं है
मोहब्बत लेकिन इस से भी हसीं है

जुनूँ की कोई मंज़िल ही नहीं है
यहाँ हर गाम गाम-ए-अव्वलीं है

सुना है यूँ भी अक्सर ज़िक्र उन का
कि जैसे कुछ तअल्लुक़ ही नहीं है

मसीहा बन के जो निकले थे घर से
लहू में तर उन्हीं की आस्तीं है

मैं राह-ए-इश्क़ का तन्हा मुसाफ़िर
किसे आवाज़ दूँ कोई नहीं है

इरफ़ान’ उस को कहीं देखा है तुम ने
सुना है वो रग-ए-जाँ से क़रीं है

आज शब-ए-ग़म में सहर आई हैं
बरसों बाद उसकी ख़बर आई हैं

देख लो मिरी दिल मे बहार आई हैं
जिसकी ख़ुशी आँखो में उतर आई हैं

रहम ऐ ग़म-ए-जानाँ बात आ गई याँ तक
दश्त-ए-गर्दिश-ए-दौराँ और मिरे गरेबाँ तक

इक हमीं लगाएँगे ख़ार-ओ-ख़स को सीने से
वर्ना सब चमन में हैं मौसम-ए-बहाराँ तक

मेरी दस्तक-ए-वहशत आज रोक लो वर्ना
फ़ासला बहुत कम है हाथ से गरेबाँ तक

है ‘इऱफान’ अज़ल ही से सिलसिला मोहब्बत का
हल्क़ा-ए-सलासिल से गेसू-ए-परेशाँ तक

कोई भी रिश्ता क़ायम न करो
मैं शायर हु मुझसे दूर रहा करो

रिश्ते मतलबी होते हैं सभी के
तुम मुझे आज़माया न करो

रिश्ता मुबारक़ हो तुम्हें तुम्हारा
मुझसे इन सब की उम्मीद न करो

कोई दम नहीं हैं तुम्हारे रिश्ते में
तुम इसे मुझसे अब दूर करो

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दूगा
मैं बे-अदब हूँ मुझसे दूर रहा करो

पत्थर की कीमत जब 
  समझ में आती है 
   सुनसान सड़क पर जब कुत्ते घेर लेते है

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तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

न पूछ-गछ थी किसी की वहाँ न आव-भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतिमाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो वो तज़्किरा-ए-ना-तमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तू ने ब-दिल वो पयाम किस का था

उठाई क्यूँ न क़यामत अदू के कूचे में
लिहाज़ आप को वक़्त-ए-ख़िराम किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ
ख़याल दिल को मिरे सुब्ह ओ शाम किस का था

हमें तो हज़रत-ए-वाइज़ की ज़िद ने पिलवाई
यहाँ इरादा-ए-शर्ब-ए-मुदाम किस का था

अगरचे देखने वाले तिरे हज़ारों थे
तबाह-हाल बहुत ज़ेर-ए-बाम किस का था

वो कौन था कि तुम्हें जिस ने बेवफ़ा जाना
ख़याल-ए-ख़ाम ये सौदा-ए-ख़ाम किस का था
इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आम वो करते ये नाम किस का था

हर इक से कहते हैं क्या ‘इरफ़ान’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे उन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

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सभी ये पूछते रहते हैं क्या गुम हो गया है
बता दूँ? मुझ से ख़ुद अपना पता गुम हो गया है

तुम्हारे दिन में इक रूदाद थी जो खो गई है
हमारी रात में इक ख़्वाब था, गुम हो गया है

वो जिस के पेच-ओ-ख़म में दास्ताँ लिपटी हुई थी
कहानी में कहीं वो माजरा गुम हो गया है

ज़रा अहल-ए-जुनूँ आओ हमें रस्ता सुझाओ
यहाँ हम अक़्ल वालों का ख़ुदा गुम हो गया है

नज़र बाक़ी है लेकिन ताब-ए-नज़्ज़ारा नहीं अब
सुख़न बाक़ी है लेकिन मुद्दआ’ गुम हो गया है

मुझे दुख है कि ज़ख़्म ओ रंज के इस जमघटे में
तुम्हारा और मेरा वाक़िआ’ गुम हो गया है

ये शिद्दत दर्द की उस के न होने से न होती
यक़ीनन और कुछ उस के सिवा गुम हो गया है

वो जिस को खींचने से ज़ात की परतें खुलेंगी
हमारी ज़िंदगी का वो सिरा गुम हो गया है

वो दर वा हो न हो, आज़ाद ओ ख़ुद-बीं हम कहाँ के
पलट आएँ तो समझो रास्ता गुम हो गया है

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तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुम से वो अफ़्साने कहाँ जाते

निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मय-ख़ाना
तो ठुकराए हुए इंसाँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

‘इरफ़ान’ अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते

मज्लिस-ए-ग़म, न कोई बज़्म-ए-तरब, क्या करते
घर ही जा सकते थे आवारा-ए-शब, क्या करते

ये तो अच्छा किया तन्हाई की आदत रक्खी
तब उसे छोड़ दिया होता तो अब क्या करते

रौशनी, रंग, महक, ताइर-ए-ख़ुश-लहन, सबा
तू न आता जो चमन में तो ये सब क्या करते

दिल का ग़म दिल में लिए लौट गए हम चुप-चाप
कोई सुनता ही न था शोर-ओ-शग़ब क्या करते

बात करने में हमें कौन सी दुश्वारी थी
उस की आँखों से तख़ातुब था सो लब क्या करते

कुछ किया होता तो फिर ज़ो’म भी अच्छा लगता
हम ज़ियाँ-कार थे, एलान-ए-नसब क्या करते

देख कर तुझ को सिरहाने तिरे बीमार-ए-जुनूँ
जाँ-ब-लब थे, सो हुए आह-ब-लब, क्या करते

तू ने दीवानों से मुँह मोड़ लिया, ठीक किया
इन का कुछ ठीक नहीं था कि ये कब क्या करते

जो सुख़न-साज़ चुराते हैं मिरा तर्ज़-ए-सुख़न
उन का अपना न कोई तौर, न ढब, क्या करते

यही होना था जो ‘इरफ़ान’ तिरे साथ हुआ
मुंकिर-ए-‘मीर’ भला तेरा अदब किया करते

तरदीद-ए-अना इश्क़ में करने का नहीं मैं
अब तर्क-ए-मरासिम से भी डरने का नहीं मैं

ज़ंजीर कोई ला मिरी वहशत के बराबर
इक तेरे कहे से तो ठहरने का नहीं मैं

कल रात अजब दश्त-ए-बला पार किया है
सौ बार सहर से तो सँवरने का नहीं मैं

क्यूँ मुम्लिकत-ए-इश्क़ से बे-दख़्ल किया था
अब मसनद-ए-ग़म से तो उतरने का नहीं मैं

दम-भर को सही इज़्न-ए-सुख़न चाहिए मुझ को
बे-सौत-ओ-सदा जाँ से गुज़रने का नहीं मैं

अब चश्म-ए-तमाशा को झपकने नहीं देना
इस बार जो डूबा तो उभरने का नहीं मैं

हर शक्ल है मुझ में मिरी सूरत के अलावा
अब इस से ज़ियादा तो निखरने का नहीं मैं

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बताता है मुझे आईना कैसी बे-रुख़ी से
कि मैं महरूम होता जा रहा हूँ रौशनी से

किसे इल्ज़ाम दूँ मैं राएगाँ होने का अपने
कि सारे फ़ैसले मैं ने किए ख़ुद ही ख़ुशी से

हर-इक लम्हे मुझे रहती है ताज़ा इक शिकायत
कभी तुझ से कभी ख़ुद से कभी इस ज़िंदगी से

मुझे कल तक बहुत ख़्वाहिश थी ख़ुद से गुफ़्तुगू की
मैं छुपता फिर रहा हूँ आज अपने-आप ही से

वो बे-कैफ़ी का आलम है कि दिल ये चाहता है
कहीं रू-पोश हो जाऊँ अचानक ख़ामुशी से

सुकून-ए-ख़ाना-ए-दिल के लिए कुछ गुफ़्तुगू कर
अजब हंगामा बरपा है तिरी लब-बस्तगी से

तअ’ल्लुक़ की यही सूरत रहेगी क्या हमेशा
मैं अब उक्ता चुका हूँ तेरी इस वारफ़्तगी से

जो चाहे वो सितम मुझ पर रवा रक्खे ये दुनिया
मुझे यूँ भी तवक़्क़ो अब नहीं कुछ भी किसी से

तिरे होने न होने पर कभी फिर सोच लूँगा
अभी तो मैं परेशाँ हूँ ख़ुद अपनी ही कमी से

रहा वो मुल्तफ़ित मेरी तरफ़ और इन दिनों में
ख़ुद अपनी सम्त देखे जा रहा बे-ख़ुदी से

कोई ख़ुश-फ़िक्र सा ताज़ा-सुख़न भी दरमियाँ रख
कहाँ तक दिल को बहलाऊँ मैं तेरी दिलकशी से

करम तेरा कि ये मोहलत मुझे कुछ दिन की बख़्शी
मगर मैं तुझ से रुख़्सत चाहता हूँ आज ही से

वो दिन भी थे तुझे मैं वालिहाना देखता था
ये दिन भी हैं तुझे मैं देखता हूँ बेबसी से

अभी ‘इरफ़ान’ आँखों को बहुत कुछ देखना है
तुम्हें बे-रंग क्यूँ लगने लगा है सब अभी से

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मेरे सिवा मुझे कोई गिरफ्तार कर नहीं सकता
मेरा वजूद मुझे बेज़ार कर नहीं सकता

मेरा शेर हसीना का मोहताज़ नहीं हो सकता
मैं यार ठुकराया हुआ हूँ किसी का हो
नहीं सकता

तू इधर न देख के दिल बे-कली हो गया हैं
तिरी ख्वाहिश न रहीं इश्क़ ख़त्म हो गया हैं

नज़र धुँधला रहीं हैं चराग़ बुझ सा गया हैं
रौशनी कम हो गयीं अँधेरा बढ़ सा गया हैं

वो चराग़-ए-राह वो चराग़-ए-राहगुज़र था वहीं छोड़ गया
मैं इक शोला था आग का गोला था जाते जाते वो बूझो गया

मुझे क्या ख़बर थीं मिरी मकां की रौशनी उस से थी
मैं इक साधा मिज़ाज़ सा था वो मिरी ऐतबार को बुझा गया

मुझे रंज हैं की मैं उसके साथ बहोत कम ही रहा
वो मेरी शमा की रौशनी था वो शमा को बुझा के गया

मैं उसकी खोज में उसकी तलाश में झुलस सा गया
मैं कश्ती को किनारें ना ला सका वो किनारा डूबा के गया

वो मिरी रौशनी थी मुझे उस पर बहोत नाज़ था
मैं उसके ईतेज़ार में खड़ा रहा मैं खड़े खड़े ही हार गया

कह देता हूँ वो बात जो बात नही कहने की
अब मुझे ख्वाइश नहीं तुझसे दिल लगाने की

बचा कर दिल अपना गुज़रा हूँ तेरी गली से
दर्द ग़म तक़लीफ़ हैं तेरे पास अब ताक़त नहीं जख़्म सहने की

अपनी हालात का तमाशा करू भी तो कैसे
आँखे इज़ाज़त नहीं देती आँसू बहाने की

अब मैं अपनी ही धुन में मसरूफ़ हूँ
दिल इज़ाज़त देता नहीं शोहरत कमाने की

मैं जहाँ हूँ वहीं के लोग रास आते हैं मुझे
तेरा दिल कोई जगहा नहीं हैं ठहर जाने की

नाम तेरा हैं लेक़िन तिलिस्म बाक़ी नहीं
काम जो तूने किया वो किसी ने किया नहीं

अब मैं हो गया हूँ नफ़रत करने का आदी
कुछ नहीं बचा राह में तेरा नाम दिल में नहीं

यानी के अब तेरा नाम दिल-ओ दिमाग़ में नहीं
बेज़ार हो चुका हूँ तेरी हरकतों से जुस्तजू बाक़ी नहीं

दिल-ओ-दिमाग़ से तुझे निकाल फेका हैं
अब दिल में तिरा कोई निशां बाक़ी नहीं

जो बात थी निभाने की वो तूने निभायी नहीं
इस छोटी सी उम्र में तूने जो किया वो किसी ने किया नहीं

मुझ बेक़सूर का क्या था क़सूर तू बता तो सही
अब तो नज़र में तेरी शक़्ल भी बाक़ी नहीं

मुझे पसंद आ जाए तू कोई चीज़ नहीं
जा तुझे मुआफ़ किया तू मेरा रक़ीब नहीं

नक़ाब रुख़ से हटाया जा रहा हैं
चाँद ख़ुद दीदार कराने आ रहा हैं

ज़माने की नज़रों से बच कर आ रहा हैं
देखों आज वो मुझे मिलने आ रहा हैं

होश कुछ भी नहीं हैं अब मुझे
वो मुझे निगाहों से पिलाता जा रहा हैं

अरमान अभी बाकी हैं उसके दिल में
देखों वो दिल से दिल मिलता जा रहा हैं

बिखेर कर वो अपने हुस्न का जलवा
मुझे अपना दीवाना बनाता जा रहा हैं

वो तुझ पे मर मिटेगी, तू उसपे फिदा होना
मोहब्बत में ज़रूरी है इक दूजे का खुदा होना

जब भी तूने जाना चाहा, आँखें भींग गईं तेरी
तुझे तो आया भी नहीं ढंग से बेवफा होना

फ़िर सुना रहा हूँ गुज़रे हुए कल की बात को
भूला हुआ था मैं बहोत देर से अपने आप को

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रहेता हैं कुछ मलाल दिल-ओ-दिमाग़ में भी
इतना भी तुम तेज़ न करो उसकी याद को

मुरझाए हुए फूलों को ख़िलते हुए नहीं देखा
आफ़ताब को मग़रिब से निकलतें हुए नहीं देखा

काग़ज़ के फूलों को भी कहतें हैं फूल यहाँ
लेक़िन उस से खुशबू को आतें हुए नहीं देखा

दिन को रात से रात से दिन को मिलते हुए नहीं देखा
फ़ासला जो हैं दोनों के दरमियां उसे किसी ने नहीं देखा

चाह कर भी वो हमारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका

रूह गयीं दिल गया गयीं आबरू भी
हम ग़म के मारों का कोई चारा न हो सका

ख़ुश हूँ के मैंने कोशिश तो की पाने की
लेक़िन मुक्कदर हमारा उस से मिल न सका

बे-चारगी पे चारागरी की हैं तोहमतें
अच्छा किसी से इश्क़ का मारा न हो सका

कुछ इश्क़ ऐसी बख़्श गया बे-नियाज़ियाँ
दिल को किसी का लुत्फ़ गवारा न हो सका

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया
पैरों में ज़ंजीरें डालीं हाथों में कश्कोल दिया

इतना गहरा रंग कहाँ था रात के मैले आँचल का
ये किस ने रो रो के गगन में अपना काजल घोल दिया

ये क्या कम है उस ने बख़्शा एक महकता दर्द मुझे
वो भी हैं जिन को रंगों का इक चमकीला ख़ोल दिया

मुझ सा बे-माया अपनों की और तो ख़ातिर क्या करता
जब भी सितम का पैकाँ आया मैं ने सीना खोल दिया

बीते लम्हे ध्यान में आ कर मुझ से सवाली होते हैं
तू ने किस बंजर मिट्टी में मन का अमृत डोल दिया

अश्कों की उजली कलियाँ हों या सपनों के कुंदन फूल
उल्फ़त की मीज़ान में मैं ने जो था सब कुछ तोल दिया

और आखिर में सिवाय गलतफहमियों के
हमारे बीच कुछ रहा नहीं,

फिर उसने वो भी सुना
जो मैंने कभी कहा नहीं।

फिर से प्रयास करने से कभी मत घबराना ,
क्योंकि इस बार सुरूवात शून्य से नहीं , अनुभव से होगी।

✍✍✍✍✍✍👍

ऊंचाई पर वही पहुंचते है
जो बदला नहीं
बदलाव लाने की सोच रखते हैं

sad shayari for boys
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