top 10 shayari of Raahat indori

Best shayeri of Raahat indori

राहत इंदौरी हिंदुस्तान के शायरों में से एक शायर है. जो हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि पूरे दुनिया में नाम रोशन किया है.

सब की पगड़ी ‌‌‌‌ को हवाओं में उछाला जाए ‌‌‌

सोचता हूं कोई अखबार निकाला जाए

पीके जो मस्त है उनसे तो कोई खौफ नहीं

पीके जो होश में है उनको संभाला जाए।

आसमा ही नहीं एक चांद भी रहता है यहां

भूलकर भी कभी पत्थर न चला जाए

अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है

बस्तियां छोड़कर जाने को कहा जाता है

पत्तिया रोज़ गिरा जाती है जहरीली हवा

और हमें पेड़ लगाने को कहा जाता है।

ऐसी सर्दी है के सूरज भी दुहाई मांगे

जो हो परदेश में वह किस से रजाई मांगे।

अपने हाकीम की फकीरी पर तरस आता है

जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे

सारा दिन जेल की दीवार उठाते रहिए

ऐसी आजादी के हर शख्स रिहाई मांगे।

खड़े हैं मुझको खरीददार देखने के लिए

मैं घर से निकला था बाजार देखने के लिए।

कतार में कई नाबिना लोग शामिल है

अमीरे शहर का दरबार देखने के लिए।

हर एक हर्फ से चिंगारियां निकलती हैं

कलेजा चाहिए अखबार देखने के लिए।

हजारों बार हजारों की सम्त देखते हैं

तरस गए तुझे एक बार देखने के लिए।

अगर खिलाफ है होने दो, जान थोड़ी हैं

यह सब धुआं है ,कोई आसमान थोड़ी हैं

लगेगी आग तो आएगी घर कई ज़द में

यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी हैं।

हमारे मुंह से जो निकले वही सदाकत है

हमारे मुंह में तुम्हारी जबान थोड़ी है।

मैं जानता हूं दुश्मन भी कम नहीं, लेकिन

हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है।

जो आज साहिबे मसनद है कल नहीं होंगे

किराएदार है जाती मकान थोड़ी है।

अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं

व मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मैं मरा नहीं हूं

वह कह रहा है कुछ दिनों में मिटा कर रख दूंगा नस्ल तेरी, है उसकी आदत डरा रहा है

है मेरी फितरत डरा नहीं हूं।

ऊंचे ऊंचे दरबारों से क्या लेना

नंगे भूखे बेचारों से क्या लेना

अपना मालिक अपना खालिक अफजल है

आती-जाती सरकारों से क्या लेना।

हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं।

जो ये दीवार का सुराख है साजिश का हिस्सा है

मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं।

फिर उसके बाद चाहे यह जुबा कटती है कट जाए

हमें जो कुछ भी कहना है अलल ऐलान कहते हैं।

मेरे अंदर से एक-एक करके सब कुछ हो गया रुखसत

मगर एक चीज बाकी है है जिसे ईमान कहते हैं।

जिंदगी को सांज सांसो को नई धुन कह दिया, कौन है

जिसने बिना सोचे हुए कून कह दिया, कौन है।

उसने इतना भी भी नहीं सोचा कि नाबिना हूं मैं

तेरे मेरे हाथ में था तो मुझको अर्जुन कह दिया।

देखना तकरीर का रुख कैसे बदला जाएगा

खून में लथपथ हुआ मौसम तो फागुन कह दिया।

इसको हर एक रोख का नुस्खा जबानी याद है

मेरे मुंह से जख्म निकला उसने नाखून का दिया।

धूल गए होठों पे सब के खट्टे, मीठे, जायके

मैंने उसकी सांवली रंग रंगत को जामुन कह दिया।

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